सोजत। प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगरी सोजत आगामी आसोज सुदी नवमी को अपने स्थापना के 973वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। लगभग एक हजार वर्ष के इस गौरवशाली सफर में शहर ने अनेक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं को संजोकर रखा है। इन्हीं में से कई रोचक प्रसंग अब इतिहास के पन्नों से सामने आ रहे हैं।

अभिनव कला मंच के सचिव एवं इतिहास शोधकर्ता चेतन व्यास द्वारा किए जा रहे ‘शहर इतिहास परिक्रमा’ संकलन के दौरान रियासतकाल से जुड़ी कई अनूठी जानकारियां सामने आई हैं। इनमें सबसे रोचक परंपरा “गधा रोपना” मानी जाती है।
बताया जाता है कि रियासतकाल में यदि कोई व्यक्ति अथवा कोई कौम राजाज्ञा की अवहेलना करती थी या किसी गंभीर अपराध की दोषी पाई जाती थी, तो उसके नाम का “गधा रोप” दिया जाता था। इसके तहत एक पत्थर पर गधे का चित्र उकेरकर महाजनी लिपि में संबंधित व्यक्ति या समुदाय का उल्लेख किया जाता था तथा उसका हुक्का-पानी बंद कर उसे नगर से निर्वासित कर दिया जाता था। इस परंपरा का एक ऐतिहासिक पत्थर आज भी धानमंडी क्षेत्र में एक मंदिर के समीप मौजूद होने की जानकारी मिलती है।

टंटा पोल का अनोखा इतिहास
सोजत के मुख्य बाजार में स्थित ऐतिहासिक टंटा पोल भी शहर के इतिहास का महत्वपूर्ण साक्षी रहा है। बताया जाता है कि यहां एक मुसाहिब बैठता था, जो बाहर से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का नाम, पिता और दादा तक का पूरा परिचय पूछता था। ऊपर बैठा मुनीम यह जानकारी सुनकर अपनी बहियों में मिलान करता और यदि संबंधित परिवार पर कोई पुराना कर्ज दर्ज होता तो उसकी जानकारी तुरंत दे दी जाती थी। यही स्थान बड़े-बड़े सामाजिक विवादों और झगड़ों के निपटारे का भी प्रमुख केंद्र था।

नशा मुक्ति का अनूठा संदेश
1960 के दशक में टंटा पोल के बाहर लगी एक अनोखी दीवार चित्रकारी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहती थी। इसमें एक विशाल शेर, उसके पेट में सांप और सांप के पेट में शराब की बोतल का चित्र बनाया गया था। नीचे बड़े अक्षरों में लिखा रहता था— “तीनों घातक हैं।” यह उस दौर का प्रभावी नशा मुक्ति संदेश माना जाता था।
सोजत में सिनेमा का सुनहरा दौर
सोजत में चलचित्रों का इतिहास भी बेहद दिलचस्प रहा है। शुरुआती दौर में मुधों का बास तथा मुख्य बाजार स्थित मेहता साहब की स्कूल में चलचित्र प्रदर्शित किए जाते थे। बाद में जोशी जी की हवेली में चौहान टॉकीज, गणेश टॉकीज और प्रवीण टॉकीज के नाम से सिनेमा संचालित हुआ। इसके अलावा मालियों की हवेली और सिंघवीयों के बास में भी सिनेमाघर चलते थे।
वर्ष 1971 में जब सुपरस्टार राजेश खन्ना की सुपरहिट फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ सोजत में प्रदर्शित हुई, तब शहर के बहुमुखी प्रतिभा के धनी स्वर्गीय सोमनाथ व्यास ने एक विशालकाय हाथी का मॉडल तैयार कराया। इसे टॉकीज के बाहर साइकिल की दुकान की छत पर कई दिनों तक रखा गया, जिसे देखने आसपास के दर्जनों गांवों से लोग परिवार सहित पहुंचते थे। उस समय यह आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन गया था।
लगभग एक हजार वर्ष पुराने सोजत शहर का इतिहास ऐसे ही अनेक रोचक प्रसंगों, परंपराओं और मधुर स्मृतियों से भरा हुआ है। शहर के स्थापना वर्ष के इस ऐतिहासिक अवसर पर इन विरासतों को सहेजना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।


