सोजत सिटी/पाली /जोधपुर।
महान शिक्षाविद, देश के सबसे युवा प्रोफेसरों में शुमार और प्रख्यात मैकेनिकल इंजीनियर स्वर्गीय डॉ. चंद्रशेखर शर्मा की जयंती के अवसर पर जोधपुर, सोजत और लुंडावास में विभिन्न गरिमामय कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। इस अवसर पर समाज के प्रबुद्ध जनों और जनप्रतिनिधियों ने उन्हें याद करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए।
पूर्व काबिना मंत्री लक्ष्मीनारायण दवे, अपर लोक अभियोजक पंकज त्रिवेदी, वरिष्ठ नागरिक समिति के अध्यक्ष सुरेश ओझा, बुढ़ायत माता मंदिर लुंडावास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष जितेंद्र व्यास, पूर्व अध्यक्ष हितेंद्र व्यास सहित चंद्रशेखर व्यास, अरविंद द्विवेदी, चेतन व्यास, धीरेंद्र, धर्मेंद्र, जनार्दन दवे, ओम प्रकाश ओझा, प्रफुल्ल ओझा, मनोज जोशी, माधव शास्त्री और सुदीप व्यास आदि ने डॉ. शर्मा को श्रीमाली ब्राह्मण समाज की एक ऐसी विशिष्ट प्रतिभा बताया, जिन्होंने न केवल राजस्थान बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समाज और देश का नाम रोशन किया।
सोजत से कनाडा तक का सफर और रिकॉर्ड तोड़ सफलताएं
डॉ. चंद्रशेखर शर्मा का जन्म 12 जून 1939 को सोजत सिटी (पाली) के ब्रह्मपुरी (बड़ा बास) निवासी माहुडा जमना शंकरजी के घर हुआ था। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी डॉ. शर्मा ने सोजत से प्राथमिक शिक्षा के बाद जोधपुर के सरदार स्कूल से पढ़ाई की, जहाँ वे सदैव प्रथम रहे। उन्होंने राजस्थान मैट्रिक परीक्षा में पूरे राज्य में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। इसके बाद जसवंत कॉलेज से इंटर की परीक्षा सभी विषयों में प्रवीणता (Distinction) के साथ टॉप की।
बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज, पिलानी से 1961 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री के दौरान उन्होंने रिकॉर्ड अंकों के साथ गोल्ड मेडल जीता और राजस्थान विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इसके बाद 1962 में IIT खड़गपुर से एम.टेक (मशीन डिजाइन) किया।
विदेश जाने वाले क्षेत्र के पहले व्यक्ति, देश के सबसे युवा प्रोफेसर
अनुसंधान के प्रति उनके जुनून के कारण 1964 में उन्हें ‘कॉमनवेल्थ स्कॉलर’ के रूप में चुना गया और वे भारत सरकार की स्कॉलरशिप पर क्वींस यूनिवर्सिटी, किंगस्टन (कनाडा) से पीएचडी करने चले गए। 1967 में जब वे पीएचडी की उपाधि लेकर सोजत लौटे, तो वे इस क्षेत्र से विदेश जाने वाले पहले व्यक्ति थे। उनके स्वागत में पूरा सोजत उमड़ पड़ा था।
शैक्षणिक करियर में उन्होंने नित नए कीर्तिमान रचे:
1967-1972: बिड़ला इंजीनियरिंग कॉलेज, पिलानी में रीडर व सह-आचार्य रहे।
1972: रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, कुरुक्षेत्र में जब वे प्रोफेसर बने, तो उन्हें देश के सबसे कम उम्र के आचार्य (प्रोफेसर) बनने का गौरव प्राप्त हुआ।
1979-1999: जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में वरिष्ठ आचार्य, विभागाध्यक्ष और डीन के पद पर सेवाएं दीं।
अंतर्राष्ट्रीय सेवाएं: 1982-84 के दौरान उन्होंने मिलिट्री इंजीनियरिंग कॉलेज, बगदाद (इराक) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया।
चिरस्मरणीय योगदान और सादगीपूर्ण जीवन
अपने शैक्षणिक जीवन में उन्होंने 50 से अधिक एम.ई. डिजर्टेशन और 7 पीएचडी शोधग्रंथों का सफल निर्देशन किया, साथ ही 70 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय शोध पत्र प्रकाशित किए। सेवानिवृत्ति के बाद उनके द्वारा लिखी गईं पुस्तकें “मशीन डिजाइन” और “डायनेमिक्स ऑफ मशीनरी” (प्रेंटिस हॉल इंडिया प्रकाशन) आज भी इंजीनियरिंग के छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं।
उनका विवाह महाराजा संस्कृत कॉलेज, जयपुर के शिक्षाविद पंडित वृद्धि चंद्र जी शास्त्री की सुपुत्री शकुंतला जी से हुआ था। उनके दोनों पुत्रों ने भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर भारतीय रेल सेवा (IRS) और भवन निर्माण क्षेत्र में उच्च पदों पर रहकर उत्कृष्ट सेवाएं दीं।
अप्रैल 2006 में उनका देवलोक गमन हुआ, लेकिन उनका आडंबरहीन, सरल, सहज और सौम्य व्यवहार आज भी लोगों के दिलों में अमिट है। उनकी जयंती पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम उनके इसी अद्वितीय अवदा न को समर्पित हैं।


