भारतीय छात्र राजनीति के कैनवास पर पिछले कुछ वर्षों में एक स्पष्ट और गहरा वैचारिक व राजनीतिक बदलाव देखा जा रहा है। समान्य महाविद्यालय परिसर से लेकर देश के अग्रणी विश्वविद्यालयों (जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय) के छात्रसंघ चुनाव तक जनादेश का रुझान एक नए राजनीतिक यथार्थ की ओर इशारा कर रहा है। छात्र राजनीति को हमेशा से देश के राजनीतिक और सामाजिक रुझान का दर्पण माना जाता है। हाल ही में पंजाब यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी (DUSU) के छात्रसंघ चुनावों के परिणामों और रुझानों ने भारत की ‘GenZ’ (नई पीढ़ी के युवाओं) की बदलती सोच का प्रतिबिंब देश-दुनिया के सामने प्रकट करने का काम किया हैं। ये चुनाव केवल परिसर के मुद्दों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्होंने देश की व्यापक राजनीतिक दिशा को भी रेखांकित किया है।
छात्र राजनीति में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) की लगातार बढ़त यह दर्शाती है कि GenZ युवाओं में राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और विकासात्मक विमर्श के प्रति एक स्वाभाविक जुड़ाव है। साथ ही छात्रसंघ चुनाव परिणाम यह स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि भारत का GenZ मतदाता विचारधारा के स्तर पर राष्ट्रवाद के साथ मजबूती से खड़ा है। जहाँ वहीं ABVP उनके इस विचार का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं स्थानीय स्तर पर उम्मीदवार की योग्यता और काम की जवाबदेही भी बेहद अहम हो चुकी है।
युवा पीढ़ी इस बात को अच्छे से समझ चुकी है कि राहुल गांधी और उसके पदचिन्हों पर चलने वाली झूठ का महिमा मंडन करती एनएसयूआई की मंडली देशभर में अराजकता फैलाने और जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी कुरीतियों को फैलने और बढावा देने के अलावा कोई काम नहीं कर पा रहीं हैं । लगातर चुनाव परिणामों में मुहकी खाकर बैठना; देश के युवाओं ने लगातार जनादेश देकर इनको और इनके राष्ट्रविरोधी एजेंडों को नकारा है।
पंजाब यूनिवर्सिटी (PU) में, जहाँ पारंपरिक रूप से क्षेत्रीय और वामपंथी या क्षेत्रीय दलों के छात्र संगठनों का प्रभाव रहा है, वहाँ ABVP ने लगातार अपनी उपस्थिति और दबदबा दर्ज कराया है। दिल्ली यूनिवर्सिटी और पंजाब यूनिवर्सिटी दोनों ही परिसरों में युवा छात्र राष्ट्रीय मुद्दों, सुरक्षा और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती छवि से प्रभावित दिख रहे हैं। ABVP का राष्ट्र-प्रथम, परिवर्तन व विकास का विचार GenZ की इस राष्ट्रवादी सोच से सीधे तौर पर मेल खाता है।
छात्रसंघ चुनावों की एक और दिलचस्प विशेषता यह रही कि जहाँ भी छात्रों को ABVP के स्थानीय उम्मीदवारों या स्थानीय नेतृत्व से शिकायत या नाराजगी रही, वहाँ छात्रों ने पारंपरिक विपक्षी दल NSUI को चुनने के बजाय निर्दलीय (Independent) प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है, लेकिन NSUI को विकल्प के रूप में भी अस्वीकार कर नकार दिया है। मुख्य विपक्षी छात्र संगठन होने के बावजूद, जब भी ABVP की कार्यप्रणाली या उम्मीदवार के प्रति छात्रों में कोई असंतोष उभरा है, तो युवाओं ने NSUI को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में नहीं देखा, अपितु निर्दलीय (Independent) प्रत्याशियों को एक सशक्त और स्वतंत्र विकल्प के रूप में चुना है और पर अपना भरोसा जताया।
लेखक- मुकेश यादव (अखिल भारतिय विद्यार्थी परिषद विभाग संगठन मंत्री,पाली


