पाली। होली के पर्व को लेकर शहर सहित ग्रामीण इलाकों में फागुन का रंग चढ़ने लगा है। शाम ढलते ही युवाओं की टोलियां चंग की थाप पर पारंपरिक फाग गीत गाती नजर आ रही हैं। बाजारों में भी चंग की बिक्री तेज हो गई है। इस बार बाजार में ऐसी खास चंग उपलब्ध है जो बरसात में भी भीगने पर खराब नहीं होती, जिससे होली खेलते हुए भी इसे बेझिझक बजाया जा सकता है।

पाली में पिछले करीब 20 वर्षों से चंग सहित अन्य वाद्य यंत्र बनाने वाले कारीगर मनोज चौहान बताते हैं कि पारंपरिक चंग का घेरा आम की लकड़ी से तैयार किया जाता है, जिसकी साइज सामान्यतः 24 से 30 इंच तक होती है। इसके ऊपर बकरे या भेड़ की खाल चढ़ाई जाती है। आधुनिक मांग को देखते हुए अब फाइबर की चंग भी बनाई जा रही है।

उन्होंने बताया कि फाइबर चंग में स्टील का घेरा लगाया जाता है, जो पानी में खराब नहीं होता और इससे निकलने वाली धुन तेज व प्रभावशाली होती है। यही वजह है कि इसकी विशेष डिमांड बनी हुई है।
होली पर बढ़ती है मांग…
मनोज चौहान के अनुसार होली के त्योहार पर चंग की मांग चरम पर रहती है। महाराष्ट्र, गुजरात सहित अन्य राज्यों में बसे राजस्थानी लोग भी ऑर्डर देकर चंग मंगवाते हैं। चंग की कीमत गुणवत्ता और डिजाइन के अनुसार करीब 800 से 5000 रुपए तक होती है। ग्राहकों की पसंद को देखते हुए अब चंग पर आकर्षक रंगों से डिजाइन और स्टील घेरे वाली चंग पर कम्प्यूटरीकृत प्रिंट का चलन भी बढ़ा है।
होली के अवसर पर गेर नृत्य करने वाले गेरिए पैरों में घुंघरू बांधकर प्रस्तुति देते हैं। इन घुंघरुओं की कीमत भी लगभग 2 से 3 हजार रुपए के बीच रहती है।
फागुन के गीतों से महक रहा माहौल..
होली के इस रंगीन मौसम में पारंपरिक फाग गीतों की गूंज चारों ओर सुनाई दे रही है। “पहलो नाम लाइजो सूंडालो गणपति देव रो”, “चंग रो धमीड़ो हां रे फागण फरवरियो”, “होळी आइगी”, “सेला बाजारां में कांई”, “ग्यारस माथे आईग्यो” जैसे गीत लोगों की जुबान पर हैं।
इसके अलावा “जोरजी चोंपावत घुड़ला बाजारों में खड़िया रे”, “रुपयो दंउ रोकड़ो”, “मेहंदी वालो खेत हर्षवीर लागो रे”, “म्हारो हिवड़ो वियो बेचैन फागण”, “झीणो-झीणो घूंघट”, “कोई मोती चमके”, “हालो रे गेरियों थाने बुलावे” और “फाग में फरमायो सेला” जैसे लोकगीत भी माहौल को पूरी तरह फागुनी बना रहे हैं।


